कुंडली में धन भाव (द्वितीय भाव) और धनेश (द्वितीय भाव का स्वामी) से संबंधित 50 सूत्र
50 sutras related to Dhan Bhava (2nd house) and Dhanesh (Lord of the 2nd house) in the horoscope
A. द्वितीय भाव (धन भाव) से जुड़े 25 सूत्र
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द्वितीय भाव धन, परिवार, वाणी, कुटुंब और बचत का प्रमुख सूचक है।
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द्वितीय भाव में स्थित ग्रह धन कमाने के तरीकों का प्रकार बताते हैं।
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धन भाव मजबूत हो तो आर्थिक स्थिरता स्वयं मजबूत होती है।
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शुभ ग्रहों की उपस्थिति (गुरु, शुक्र, बुध) धन संचय को बढ़ाती है।
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पाप ग्रह (शनि, राहु, केतु, मंगल) धन भाव में हो तो उतार-चढ़ाव लाते हैं।
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गुरु या शुक्र की दृष्टि धन को स्थिर और बढ़ाती है।
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चंद्र द्वितीय में हो तो आय उतार-चढ़ाव वाली होती है।
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सूर्य द्वितीय भाव में सरकारी या प्रतिष्ठित माध्यम से धन देता है।
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मंगल द्वितीय भाव में भूमि, साहस और जोखिम से धन देता है।
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शनि द्वितीय में हो तो धीरे-धीरे स्थायी धन आता है।
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राहु द्वितीय में तेज उन्नति और अचानक हानि दोनों दे सकता है।
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केतु द्वितीय में रहस्यमय या आध्यात्मिक साधनों से धन दे सकता है।
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द्वितीय भाव वाणी का होता है इसलिए वाणी से भी धन प्राप्ति संभव है।
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द्वितीय भाव पर पाप प्रभाव अधिक हो तो बचत कम होती है।
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द्वितीय भाव में वक्री ग्रह धन आने में विलंब कराते हैं।
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बलवान द्वितीय भाव जातक को अपने परिवार का पालनकर्ता बनाता है।
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धन भाव शुभ हो तो निवेश और व्यापार में लाभ मिलता है।
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द्वितीय भाव का संबंध 11वें भाव से जुड़ जाए तो स्थायी आय बनती है।
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6-8-12 भाव का भारी प्रभाव धन हानि करवाता है।
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नवांश में धन भाव मजबूत हो तो धन स्थिर रहता है।
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द्वितीय भाव के ग्रह धन उपयोग की मानसिकता दर्शाते हैं।
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लग्नेश द्वितीय में हो तो आय स्थिर रहती है।
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ग्रहों का दिग्बल धनभाव को और शक्तिशाली बनाता है।
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द्वितीय भाव में शुभ योग (बुधादित्य, लक्ष्मी योग आदि) धन को बढ़ाते हैं।
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धन भाव कमजोर हो पर धनेश मजबूत हो तो धन स्थिति सुरक्षित रहती है।
B. धनेश (द्वितीय भाव के स्वामी) से जुड़े 25 सूत्र
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धनेश जिस भाव में जाता है, वही धन का मुख्य स्रोत बन जाता है।
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मजबूत धनेश जातक को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाता है।
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धनेश केंद्र (1,4,7,10) या त्रिकोण (1,5,9) में हो तो धन योग बनता है।
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धनेश वक्री हो तो धन में देरी और संघर्ष होते हैं।
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धनेश पर पाप दृष्टि आर्थिक संघर्ष देती है।
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धनेश पर शुभ दृष्टि धन को बढ़ाती है।
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धनेश अपनी राशि या उच्च राशि में हो तो अपार धन देता है।
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नीचस्थ या अस्त धनेश धन कमी और आर्थिक चिंता देता है।
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धनेश की दशा-भुक्ति आर्थिक बदलाव लाती है।
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धनेश और लग्नेश का संबंध मजबूत धन योग बनाता है।
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धनेश 11वें भाव में हो तो अत्यधिक धन लाभ होता है।
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धनेश 9वें में हो तो भाग्य से धन वृद्धि होती है।
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धनेश 10वें में हो तो कर्म और करियर से धन मिलता है।
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धनेश 5वें में हो तो बुद्धि, शिक्षा, शेयर-सट्टा से धन मिल सकता है।
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धनेश 8वें भाव में पैतृक, बीमा, गुप्त संपत्ति से लाभ (पर जोखिम भी) देता है।
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धनेश 12वें में हो तो खर्च बढ़ जाते हैं।
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धनेश का राहु-केतु से संबंध अचानक लाभ या हानि देता है।
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धनेश नवांश में उच्च हो तो धन स्थिर रहता है।
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धनेश का सूर्य से संबंध सरकारी धन या पद देता है।
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शुक्र से संबंध कला, आकर्षण, व्यवसाय से धन देता है।
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मंगल से संबंध भूमि, निर्माण, प्रॉपर्टी से धन देता है।
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शनि से संबंध धीरे-धीरे पर स्थायी आय देता है।
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चंद्र से संबंध आय को परिवर्तनशील करता है।
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धनेश द्वितीय भाव में ही बैठा हो तो जन्मजात धनी योग बनता है।
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धनेश शुभ हो तो कमजोर धन भाव भी मजबूत परिणाम देता है।
